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दीपक एक जलाया है

जीवनसंगी , राह चले थे हमदोनों एक साथ

आगे कदम बढ़ाया कैसे , झटक चल दिये हाथ ...!

 

मैं अब भी इस पार खड़ी हूँ , आप खड़े उस पार

 शायद मेरा संबल बनने जब मैं आऊँ उस पार ।

 

जाने कितने पल छिन गुजरे , दिवस रैन संग साथ

जाने कितने सुख दुख बांटे , रोते हँसते साथ ।

 

आज खड़ी हूँ  मैं मझधारे, आप खड़े उस पार

जाने अब कब मिलना होगा ,कब हम होंगे साथ !

 

सोते जगते सपनों मे भी करती हूँ  महसूस

 पलक झपकते ना पाऊँ तो हो जाती मायूस ।

अभी  जहां हैं आप कभी हमको भी आना होगा

सफर रहे आसान ध्यान इसका तो रखना होगा ।

 

अपनी सारी चिंताएँ , दुख दर्द समर्पित करती हूँ

खामोशी, अलगाव, अकेलेपन की पीड़ा, त्रास,

खालीपन का दंश, हृदय का दर्द समर्पित करती हूँ ।

है करबद्ध निवेदन मन मे सदा करें अधिवास,

दे कर आशीर्वाद, प्रेरणा, मार्ग प्रदर्शन साथ ।

बच्चों पर हो वरद हस्त, सब  संकट कर दें दूर

आप हमारे सदा संग हैं, भले खड़े हों दूर।

 

एक प्राण हम, एक भावना, एक ही जीवन ध्येय

हे मेरे परमेश्वर , जीवन संबल, पथ-पाथेय  !

आज आपकी पुण्य स्मृति मे दीपक एक जलाया है !

आज आपके श्री चरणों मे अंजुरी भर पुष्प चढ़ाया है ! 

                       

            ....माता जी श्रीमती शीला लाल की ओर से

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मेरे भैया मेरे पिता

                                                              - ब्रजनंदन

 

हम पाँच भाइयों मे  सबसे बड़े थे हरिनंदन लाल । उनमे भाइयों के प्रति राम जैसा स्नेह , भारत जैसी विनम्रता और  पिता का अनुशासन था । पाँच भाइयों  मे बीच मे  था मैं, तीसरे नंबर पर। दूसरे  नंबर पर लाल भैया , लक्ष्मी नन्दन जी थे ।

पिता के निधन और धन सम्पत्ति चले जाने के बाद  माँ ने जिस साहस के साथ हम सभी छह भाई बहनों को पाला, वह आज भी चर्चा मे है । बड़े भैया स्कूली शिक्षा के बाद नौकरी करना चाहते थे ।लंबे खेत खलिहान के वावजूद उन्होने पहली बार पचास रुपए की नौकरी पटना स्थित सदाकत आश्रम मे गौशाला मे पकड़ ली। यही वेतन बहुत दिखता था। कलेक्टर 350 रुपए और डिप्टी कलेक्टर 125 रुपए पाते थे । प्रशिक्षण के लिए वे मन्ना बाबा ( योगेंद्र लाल ) के साथ गांधी जी के आश्रम वर्धा भी गए । लौटे तो झंझारपुर के पास रखवारी गौशाला मे मैनेजर के पद पर बहाल हुए। समय समय पर मैं भी माँ का बनाया हुआ  कुछ संदेश ले कर उनके पास जाता था । उसके बाद भैया रांची आ गए और वहाँ की गौशाला मे मैनेजर हुए।

इस दौरान अनेक घटनाएँ हुई जिनका विस्तार से वर्णन क्या करूँ । बड़े भैया जैसे लोग समाज मे कम मिलते हैं। हमेशा  वे जहां भी रहे घर के खेत खलिहान तथा परिवार के लोगों के साथ जुड़े रहे। परिवार के प्रत्येक लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता  थी । हम पाँच भाई थे मगर मेरे ऊपर उनकी अधिक  कृपा थी । परिवार के लोगों के प्रति उनके मन मे बुद्ध की करुणा और ईसा  की दया थी । उनका मन वचन और कर्म गाँव की मिट्टी से जुड़ा था । कभी भी उन्हें विचलित होते हुए नहीं देखा और न कभी मेरे विचारों से अलग हुए।एक समय ऐसा आया कि हम दोनों भाइयों ने यह विचार किया था कि अभाव से जूझ रहे अपने काका राम लखन लाल के परिवार को अपने परिवार मे मिला ले, मगर कई बैठकों के विचार के बाद भी यह योजना सफल नहीं हो सकी।

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 अपने आदरणीय भैया को पूरी ज़िंदगी मे एक बार विचलित होते  हुए देखा  था ।  गौशाला का उन्होने अपने कार्य-काल मे बहुत विस्तार किया । श्वेत क्रांति मे उनका अभूतपूर्ण योगदान था। रांची के सभी वर्गों मे  उनकी प्रतिष्ठा थी। वे एक अच्छे प्रबन्धक के रूप मे जाने पहचाने गए। यह गौशाला रांची का माड़वारी समाज चलाता था । प्रबंध समिति मे विवाद के कारण इन्हें गौशाला की  नौकरी छोड़नी पड़ी । उस वक्त भैया को पहली बार दुखी होते हुए देखा । तब मैं रांची कॉलेज का विद्यार्थी था और एक अंग्रेजीअखबार से जुड़ा हुआ भी  था। इसके कारण उस विश्वविद्यालय क्षेत्र मे मेरी पकड़ और पहचान थी । उस अंग्रेजी अखबार को मैं विश्वविद्यालय   की खबर देता था । जब भैया गौशाला से हटे तो सवाल उठा उनके नियोजन का । एक प्रोफेसर के यहाँ उठता बैठता था । उन्होने राय दी कि यदि आप थोड़ा सा प्रयास करें तो आपके भाई को विश्वविद्यालय मे नौकरी मिल सकती है । और लोगो ने भी इसी तरह की राय दी । इस वक्त रांची विश्वविद्यालय का कुलपति अंग्रेज़ नस्ल का व्यक्ति था जिसका नाम था  ए ० एफ०  मारखम ( आर्थर फ्रांसिस मारखम ) । वह बड़ा ही ईमानदार और नियमों का पालन करने वाला था। तब रजिस्ट्रार भी भौतिक शास्त्र के प्रोफेसर डॉ गुप्ता थे। ये बहुत ही कड़े मिजाज के थे। अपने विषय के अच्छे ज्ञाता थे । एक रात मैंने अपनी बात मारखम साहब को बताई और वह समय आया जब मेरे भैया रांची विश्वविद्यालय की सेवा मे आ गए ।  फिर मेरे परिवार को लगा कि सारा सुख और वैभव हमे मिल गया। हम अभी भाइयों का पढना लिखना रांची मे हुआ । भैया के कारण रांची हम सब के लिए तीर्थ धाम बन गया । भैया आज नहीं है इसका अहसास आज हमे नहीं हो रहा है। लगता है कि वे आज भी रांची के पहाड़ी  वाले मकान मे होंगे अथवा और कहीं रुक गए होंगे । ऐसे अच्छे भाई  जन्म जन्मांतर मे भी शायद किसी को नसीब न हो!

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मेरे आदर्श  - मेरे बाबूजी

 

मेरे बाबूजी स्व० हरिनन्दन लाल आज हमारे साथ सशरीर उपस्थित नहीं हैं । उनके अभाव मे मैं अपने आप को पूर्ण महसूस नहीं करता हूँ । परन्तु वे हमारे दिल मे, यादों मे हमेशा रहते हैं । कोई भी कार्य सम्पन्न करने का निर्णय लेता हूँ तो परलोक से भी उन्हीं के आशीर्वाद से सम्पन्न कर पाता हूँ ।

मेरे बाबूजी ही मेरे आदर्श हैं । मैं उन्हीं की  राह पर चल कर एक  अच्छा पिता , अच्छा भाई, अच्छा  बेटा और अच्छा सामाजिक व्यक्ति बनना चाहता हूँ और कोशिश करता हूँ। मुझे याद है कि बचपन से ही मैं उनके साथ सबसे ज्यादा रहा हूँ । मैंने  नजदीक से उन्हें जाना है ।

मेरे बाबूजी का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के निमैठी गाँव मे सम्भवत: १९२७ ई० मे हुआ था। उनकी ज़िंदगी बहुत उथल-पुथल से भरी  और संघर्ष पूर्ण रही । कठिन घड़ियों मे अपने आप को और अपने परिवार को कैसे अदम्य  साहस के साथ संभाला जाय  ये उनसे सीखने की जरूरत है। एक जमींदार स्व० बाबू राम शरण लाल  के बेटे, जिन्हें सुख ही सुख मिलना चाहिए था, उन्हें बाल्यावस्था मे ही माता स्व० सत्यभामा देवी के निधन के कारण  मातृ सुख से वंचित होना पड़ा । उनके छोटे भाई स्व० लक्ष्मी नन्दन कर्ण मात्र डेढ़ वर्ष के  दुधमुंहे बालक ही थे।  परंतु कुछ समय के बाद एक ममतामयी माँ ( स्व० सावित्री देवी ) का पदार्पण हुआ जिन्होंने अपने आँचल की छाया प्रदान कर माँ  की ममता बरसायी। जीवन परिपूर्ण हो गया। चार भाइयों (स्व० लक्ष्मीनंदन कर्ण, श्री ब्रजनंदन , श्री शिव नन्दन लाल एवं स्व० देव नन्दन ) और एक प्यारी बहन (श्रीमती निर्मला लाल) के साथ खुशी पूर्वक बचपन गुजरने लगा ।

परन्तु विधि की विडम्बना कुछ ऐसी  हुई कि कुछ ही समय के बाद पिता  का  साया भी उठ गया। जमींदारी प्रथा भी चली गयी । एक आगजनी मे जमीन जायदाद के कागजात भी  जल कर राख हो गये । कोई देखने वाला नहीं। घर से बाहर निकलने की प्रथा नहीं हुआ करती थी । ऐसे समय मे कर्मठ माँ और पांचों भाइयों  मे सबसे बड़े, परंतु 

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नाबालिग,  मेरे बाबूजी  के कंधों पर पूरा बोझ आ पड़ा । गाँव के, और कुछ अगल-बगल के गाँव के खेत ही अपने कब्जे मे रख पाये । बाँकी  सब खेतों  का पता भी नहीं चल पाया। विपत्ति का पहाड़ उनके परिवार  पर टूट चुका था, जिसे  संभाल पाना मुश्किल सा हो गया। पढ़ना लिखना भी मुश्किल  हो गया  । कौन पढ़ाएगा लिखाएगा ये समस्या भी आ गयी । उस समय उनके ननिहाल मे एक मामा ने उनको  बुला लिया । किसी तरह मैट्रिक  तक की पढ़ाई की । आगे की पढ़ाई के  लिए वे  गांधी जी के वर्धा आश्रम, नागपुर  चले गये, जहां से उन्होने  पशु चिकित्सा के कोर्स मे  डिप्लोमा डिग्री लिया । वर्धा के उस गांधी  आश्रम मे उन्होने  जीवन यापन की कई कलाओं को सीखा । तत्पश्चात उन्होंने  रखवारी  गौशाला, झंझारपुर ; श्री कृष्ण गौशाला, आरा; पटना गौशाला, पटना  और अंत मे रांची गौशाला, रांची  मे पशु चिकित्सक के रूप मे नौकरी की। जल्द ही उनकी प्रशासनिक विलक्षणता के गुण देख कर गौशाला न्यास कमीटी ने उन्हें रांची के तीन गौशालाओं  रांची , सुकुरहुट्टू एवं तिरील का मुख्य प्रबन्धक बना दिया । वे बड़ी  कुशलता के साथ गौशालाओं को दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्की की  राह पर ले गये । गौशालाओं  की आमदनी शीर्ष पर थीं। उन्होने अपने क्षेत्र के कई गरीब गुरबो को  रांची मे बसाया  जो अब सभी खुशहाल स्थिति मे जीवन यापन कर रहें हैं। उन्होने अपने परिवार  की जिम्मेवारी ली । भाइयों को अपने पास रख कर पढ़ाया लिखाया और सबको काबिल बनाया। मुझे याद है कि सबसे ज्यादा  बौआ काका (  श्री ब्रजनंदन जी  ), जो अब पटना मे अपनी प्रतिभा के साथ एक बड़े जाने माने पत्रकार हैं और भैया काका  (छोटे चाचा स्व० देवनंदन जी) इनकी छत्र छाया मे रहे ।

मुझे याद है कि  हम सब भाई बहन बहुत छोटे छोटे थे । मैं अक्सर सुबह और शाम बाबूजी के साथ रिक्शे  पर बैठ कर गौशाला चला जाता था और खाली समय मे उनसे अँग्रेजी शब्दों को सीखता था  । जीवन यापन बहुत अच्छी  तरह चल रहा  था । किसी चीज का अभाव ना था । परंतु भगवान को इतने संघर्ष के बाद मिला सुख भी मंजूर न 

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था। उन्हें  और परीक्षा लेनी थी ।उस समय गोशाला के लिए एक अच्छी नस्ल का घोड़ा खरीदा गया। बाबूजी जमींदार के बेटे थे । शान शौकत तो उनके अन्तर्मन मे विद्यमान थी । रोज सुबह शाम घुड़सवारी किया करते थे । एक दिन की बात है कि मैं  और मेरा छोटा भाई राजू (अरविंद कुमार) गौशाला मे ही थे  और उनका इंतजार कर रहे  थे । वे  घोड़े से अचानक  गौशाला के मैदान मे आए और  उतरने लगे तो उनका एक  पैर जीन मे फँस गया और वे नीचे लटक गए। पता चला कि एक पैर टूट गया है। उनके दुख का मुझे कोई अनुमान नहीं था । हम लोगों को घर पहुंचा दिया गया। माँ को भनक लग गई थी कि कोई घटना हुयी है। उन दिनों हमारे बाबूजी हम लोगों को एक पैर मोड़ कर एक पैर से कूदने का लुल्लू घोड़ा खेल खेलाते  थे तो माँ के पूछने पर बताया कि बाबूजी एक पैर के लुल्लू घोड़ा हो गए हैं । माँ इस बात को समझ नहीं पायी लेकिन मेरे  छोटे भाई राजू ने बहुत धीरे से बताया- बाबूजी खेस पड़लखिन्ह । उनके एक पैर की हड्डी टूट गई थी जिसके कारण उन्हें  करीब एक साल तक घर मे  बिस्तर पर रहना पड़ा ।

समय ने करवट ले ली ।घर से गौशाला का काम उस अवस्था मे सुचारु रूप से नहीं हो पाता था ।  गौशाला न्यास कमिटी ने घुमा फिरा के ये बात बताई । उन्होने तुरंत इस्तीफा दे दिया । अब घोर संकट की घड़ी आ गई।सगे संबंधी सभी धीरे- धीरे अपना  रास्ता पकड़ लिए। अब जीवन यापन का सवाल था। परंतु  मेरे बाबूजी ने हिम्मत नहीं हारी । गाँव मे खेती बारी होती थी पर कभी भी, इस अवस्था मे भी उन्होने अनाज पानी लेने की कोई कोशिश नहीं की । हाँ कुछ समय के लिए मेरे दो बड़े भाइयों (स्व० अनिल कुमार लाल और राजा अजीत कुमार) को गाँव भेज दिया गया।

संघर्ष का जीवन शुरू हो गया। वे  इधर उधर जीवन यापन के लिए नौकरी ढूँढने लगे ।उन्होने उषा सिलाई कंपनी , रांची रेडियो स्टेशन आदि मे अस्थायी नौकरी की। परन्तु अन्त मे रांची विश्वविद्यालय मे एक सहायक के रूप मे कार्य आरंभ किया । फिर हमलोग  सभी भाई बहन और  चाचाओं  के साथ जीवन यापन करने लगे।   परिवार बड़ा 

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था, आमदनी उसके लिए काफी कम थी , फिर भी गाँव- घर- परिवार को देखते हुए उन्होने  भाई बहनो की शादी  सब की  जिम्मेवारी  एक बड़े भाई की  तरह  उठाई । श्री ब्रजनंदन चाचा भी एक श्रेष्ठ पत्रकार बन कर पटना चले गए। छोटे चाचा (स्व० देवनंदन) हमलोगों के साथ सबसे ज्यादा रहे और पत्रकार की नौकरी करने के बाद अपना मकान बना कर अपने परिवार के साथ रांची मे ही बस गए।

आमदनी  कम  और परिवार बड़ा होने के कारण हमलोगों की पढ़ाई पर असर पड़ता था । पढ़ाई को वे सबसे ज्यादा महत्व देते थे। मेरे बाबूजी को भी आगे पढ़ने की अभिलाषा थी।उन्होने नौकरी के दौरान सायंकालीन होमियोपैथी कॉलेज मे दाखिला ले कर चार साल की पढ़ाई कर डाक्टर की डिग्री ली। तब से वे  डाक्टर साहब के नाम से जाने जाते थे। कई गरीबों का वे  मुफ्त इलाज किया करते थे । हमलोगों ने भी उनको बहुत निराश नहीं किया । हमलोगों ने कॉलेज के दौरान किताबों की कमी तो  बहुत महसूस की, परंतु  लाइब्रेरी से किताबें  और किसी की दी  हुई  स्पेसिमेन किताबों  के माध्यम से ही एम० एससी० तक की डिग्री प्राप्त की। मेरी माँ  श्रीमती शीला लाल पढ़ने मे बहुत अव्वल थी, बाबूजी ने उन्हें भी एम० ए० और बी०एड० तक की शिक्षा दिलवाई। मेरे बाबूजी मे  आधुनिक दुनियाँ की पहचान थी । उन्होने परंपरा से हट के, लोगों के विरोध के वावजूद माँ को नौकरी करने की इजाजत दे दी। माँ ने पहले कुछ वर्षों तक मिडिल स्कूल मे शिक्षिका के रूप मे काम किया, फिर बाद मे बिहार बोर्ड कमीशन से उच्च विद्यालय मे सहायक शिक्षिका के रूप मे कार्य किया। अपनी   प्यारी सी  बेटी श्रीमती विभा मल्लिक का विवाह सुपौल जिले के नामी गिरामी  परिवार मे राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित पुलिस  इंस्पेक्टर  सुरेश्वर नाथ मल्लिक  से की । शादी  हुए अभी  पाँच साल ही बीते  थे  कि मेरे बहिनोई का देहांत हो गया । सबसे बड़े भाई स्व०अनिल कुमार लाल  रांची  महिला महा- विद्यालय मे शिक्षकेतर कर्मचारी थे । उनका भी निधन २०००  ई० मे हृदय रोग के कारण  हो गया ।  इन दो बड़ी घटनाओं ने   बाबूजी सहित हमलोगों को अंदर से हिला दिया। गम को अपने सीने मे लिए हुए बाबूजी ने  बहुत साहस के साथ आगे का कदम बढ़ाते हुए अपने पोते कुमार अभिषेक (मुन्नू), पोती मनीषा लाल , नाती 

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सौरभ मल्लिक एवं  नतिनी खुशबू मल्लिक को भी अपने  पास रख कर अपने संरक्षण मे उनका भविष्य तैयार किया ।

एक बात की कसक हमेशा बाबूजी को रहती थी और माँ से कहते थे कि अगर पैसा होता तो विजय को (मेरा पुकारु नाम) यदि कोचिंग क्लास मे दाखिला कर पढ़ाते ( जो उस समय पटना मे चलता था, जिसकी  फीस एक हज़ार थी) तो अवश्य  वो डाक्टर बन जाता। ये उनका सपना था जो मैं पूरा न कर सका । परंतु उनके आशीर्वाद से मैंने एम० एस-सी० करने के बाद पी०पी०के०कॉलेज बुन्डू  मे व्याख्याता पद पर सेवा आरंभ कर दी। फिर मैंने पीएच० डी० कर डाक्टर  की उपाधि भी हासिल कर ली ।  उनके पुण्य प्रताप और आशीर्वाद से मैं अभी एसोशिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष ,वनस्पति विज्ञान विभाग , पी०पी०के०कॉलेज, बुन्डू, रांची मे पदस्थापित हूँ । मेरे बड़े भैया डॉ० राजा अजित कुमार, विभागध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग , के०सी०बी०कॉलेज, बेडो, रांची मे कार्यरत  हैं । मेरा छोटा भाई अरविंद कुमार , अभिकर्ता एवं खनिज अभियंता, झारखंड खनिज विकास निगम मे कार्यरत है। मेरी बहन श्रीमती विभा मल्लिक , असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर , पुलिस  विभाग, रांची मे पदस्थापित है।

बाबूजी अपने रहते सभी जिम्मेवारी को पूरा कर लिए । बड़ी पोती मनीषा ने भी इंजीनियरिंग  किया और उसका विवाह महिनाम गाँव के एक अच्छे परिवार के योग्य वर श्री अविनाश कुमार (सॉफ्ट वेयर इंजीनियर, शिकागो) से  अपने सामने किए ।  उन्हें इस दुनिया से जाने का आभास  होने लगा था । जब मेरा बड़ा बेटा अरुणाभ अर्णव (सन्नी) पढ़ाई के लिए मनिपाल के लिए जाता तो वे भी स्टेशन तक साथ जाते और रोते हुए विदा करते कि पता नहीं मैं फिर तुम्हें देख पाऊँगा या नहीं ? आखिरकार वे  ०५ अप्रैल २०१२ को  हम लोगों को छोड़ कर स्वर्गलोक चले गये।

फिर उनके आशीर्वाद से उनकी नतिनी सुमन  मल्लिक [ (खुशबू)( पदाधिकारी,  आईसीआईसीआई बैंक )] की शादी  सीबीपट्टी गाँव के एक अच्छे परिवार के योग्य वर  श्री अखिलेश कुमार (चीफ एच० आर० , इंफीकेयर कंपनी ,दिल्ली ) के संग हमलोगों ने कराई। आज बाबूजी 

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नहीं हैं लेकिन जहां कही भी होंगे  उन्हे जरूर खुशी होगी कि  उनके  बड़े   पोते अभिषेक की शादी एक सुशील  कन्या  श्रीमती नीतू के संग हुई। अभिषेक एक प्राइवेट कंपनी मे सहायक प्रबन्धक एवं कोचिंग इंस्टीट्यूट मे शिक्षक है। नाती डॉ० सौरभ मल्लिक  एवं एक पोता डॉ० मिहिर राज डेंटल डाक्टर बन गया है । सौरभ  की भी शादी एक अच्छे घर मे श्रीमती  डॉ० खुशबू लाल से सम्पन्न हुई। सौरभ अभी क्लीनिक और कई अस्पतालों मे डेंटल प्रैक्टिस करता है। दो पोते आलोक राज एवं पारिजात परिमल अच्छे मल्टीनेशनल कंपनी मे सॉफ्ट वेयर  इंजीनियर के रूप मे काम कर रहें हैं। एक पोता अरुणाभ अर्णव दो सालों तक  सॉफ्ट वेयर  इंजीनियर के रूप मे काम करने के बाद  आगे की पढ़ाई  एम०एस० के लिए जी० आर० ई०की परीक्षा  कंपीट कर  न्यूयॉर्क यूनिवरसिटी गया है। एक साल पढ़ाई खत्म करने के वाद उसका सेलेक्सन इन्टर्नशिप   के लिए अमेज़न कंपनी मे हुआ है।सबसे छोटी पोती आकांक्षा (अप्पी) बंगलुरु के एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज मे द्वितीय वर्ष की छात्रा है और सबसे छोटा पोता आयुष  (हरिओम) अभी स्कूल मे पढ़ाई कर रहा है।

 

आज हमलोग जिस खुशहाल स्थिति मे हैं वह  हमारे पूज्य बाबूजी के संघर्ष, कर्मठता, व्यवहार कुशलता , प्रेम एवं अच्छे संस्कारों द्वारा बोये गये बीज का ही प्रतिफल है। हमलोग उनकी इस तपस्या को कभी नहीं भूलेंगे।

 

मैं उनकी पाँचवी पुण्य तिथि पर  अपनी पत्नी डॉ० श्रीमती विनीता कुमारी के साथ हृदय से उन्हें स्मरण कर कोटि कोटि  प्रणाम करता हूँ और आश्वस्त  करता हूँ कि उनके दर्शाये गये रास्ते पर चल कर उनकी गरिमा को  अक्षुण्ण बनाए रखूँगा।

 

आई लव यू बाबूजी !!

                                             -आपका प्यारा बेटा विजय

                                                  (डॉ० अरुण कुमार)

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स्मृति

                                             -  डा. राजाअजीतकुमार(राजा)  

                                                                   सुपुत्र

जब कभी पुरानी यादों में खो जाता हूँ तो लगता है कि इतनी जल्दी कैसे दिन बीत गए,  पता नहीं चला।  कभी सोचता रह जाता हूँ कि बाबूजी अब नहीं रहे, बाबूजी अब नहीं रहे।

मनुष्य ईश्वर का अंश है, ईश्वर से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति  मिले और वे अप्रत्यक्ष रूप से, सपनों में ही सही, हम सबों का आशीर्वाद के तौर पर मार्गदर्शन करते रहें। उनका दीप ऐसे जले कि कोई तूफ़ान भी उसे बुझा न पाए।

स्व. बाबूजी हमलोगों के बीच प्रेरणादायक स्रोत के स्तम्भ थे।  माँ को हमेशा कहते थे कि बच्चे सब को सुबह का नाश्ता स्नान के बाद ही मिले और हम लोगों को कहते थे कि कभी भी भोजन कस कर नहीं करना चाहिए - "एक कौर कम खाओ, पेट ठीक रहेगा"।  वे किसी भी बच्चे का चाय, पान, तम्बाकू आदि का सेवन पसंद नहीं करते थे। एक बार की घटना है घर में मेहमान सब आये हुए थे, उस वक़्त मैं इंटर का छात्र रहा हूँगा। बाबूजी बाहर के कमरे में लोगों के साथ चाय पी रहे थे। मैंने भीतर आँगन की ओर प्रवेश किया।  माँ महिलाओं के साथ चाय पी रही थी - साथ में छोटी बहन रेणु (विभा मल्लिक) भी थी।  माँ ने मुझे देख कर चाय का प्याला थमा दिया।  मैं भी धीरे धीरे चाय पीने लगा। सभी लोग चले गए। बाबूजी मुझे चाय पीता देख आग बबूला हो गए और माँ को भला-बुरा कहने लगे।  केतली में बचे हुए चाय को भी फेंक दिया।  मैं डर से बाहर निकल गया। उसके बाद से मैंने विद्यार्थी जीवन में चाय,पान,तम्बाकू का सेवन कभी नहीं किया। अब भी साथियों एवं मेहमानों के बीच केवल चाय पी लेता हूँ , परंतु आदत अभी भी नहीं है।

आँखों में छुपाये फ़िर रहा हूँ  यादों के बुझे हुए सबेरे। मुझे बचपन की एक और घटना याद आ रही है।  मुझे बुखार खूब ज़ोरों की लगी हुई थी। १०३- १०४ से कम नहीं हो रहा था।  बाबूजी होमियोपैथी की 

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डॉक्टरी भी करते थे।  उन्होंने अपनी दवा से इलाज किया फिर भी बुख़ार १०० से कम होने का नाम भी नहीं ले रहा था - करीब २०-२५ दिनों से ऊपर हो रहा था। इस दवा की स्लो इम्प्रूवमेंट होने के कारण दिन बीत रहे थे। केवल बार्ली साबूदाना और पानी पर ज़िंदा था।  सूखकर तो कांटा  हो गया।  बाबूजी हिम्मत नहीं हारे, वे अपने गुरु स्वामीजी को बुला कर लाये।  उन्होंने कहा दवा सब तो ठीक पड़ रही है।  ठीक हो जाना  चाहिए था। वे भी आश्चर्यचकित थे।  माँ-बाबूजी भी चिंतित अवस्था मे  मुझे आर. एम्. सी. एच. (अभी रिम्स ) में भर्ती करवा दिए। माँ हमेशा मेरे साथ रहना चाहती थी।  परंतु घर में भाई-बहन के कारण घर-बाहर करने लगी। बाबूजी सारा टेस्ट करवा दिए परंतु कुछ भी नहीं निकला और बुखार स्वतः उतर गया।  माँ-बाबूजी मुझे  लेकर घर आ गए।  मुझे हल्का  सुपाच्य उबला हुआ खाना मिलने लगा, चूँकि पेट कमज़ोर था।

 

किसी ने खूब कहा है, मुझे इतनी फुरसत कहाँ कि मैं तकदीर का लिखा देखूं , बस बेटी-बेटे की मुस्कराहट देखकर समझ जाता हूँ कि मेरी तकदीर बुलंद है।

बाबूजी हमेशा कहते थे कि सत्य, ईमानदारी और मेहनत से कमाया हुआ धन हर प्रकार से सुख-शांति देता है।  छल कपट से कमाया हुआ धन दुःख ही दुःख, अशांति देता है। हम लोग भी उन्हीं के बताये हुए मार्ग पर चलने की कोशिश करते रहते हैं। 

 

स्व. बाबूजी धार्मिक प्रकृति के थे।  उन्हें तीर्थाटन बहुत पसंद था।  एक बार माँ-बाबूजी के साथ मुझे भी पत्नी एवं बच्चे  (मिहिर राज) के साथ घूमने का मौका लगा।  गायत्री परिवार के लोगों के साथ बस से ही विंध्याचल, इलाहाबाद, काशी (बनारस), मथुरा वृन्दावन, गोकुल सोनीपत, स्वर्ण मंदिर, हरि-की-पौड़ी, ऋषिकेश,वैष्णव देवी (जम्मू), अयोध्या आदि घूमने का कार्यक्रम बना। विन्घ्याचल जाने के क्रम में माता विंध्यवासिनी देवी के दर्शन हेतु गंगा स्नान के लिए सभी निकले। 

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गंगा में उफान था।  हमलोग किनारे में ही स्नान कर ऊपर आ गए परंतु माँ थोड़ा अंदर जाकर नहाने लगी। गंगा की तेज़ धारा के कारण भसियाने लगी। तभी बाबूजी की  नज़र पड़ी और वे ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगे। पंडा को पकड़ के लाये।  पंडा तैर कर आगे बढ़ा और माँ को खींच कर किनारे लाया।  कोई माता की कृपा से ही बाबूजी के माध्यम से माँ बची नहीं तो आज नहीं रहती।

माँ बाबूजी को गायत्री माता एवं ईश्वर पर विश्वास बहुत ही ज़्यादा था। इलाहाबाद संगम में स्नान करने निकले - यहाँ भी उफ़ान ज़्यादा था - हम लोग किनारे में ही स्नान कर आ गए परंतु माँ -बाबूजी पंडा के संग स्नान कर ही लौटे  । हरि की पौड़ी में भी गंगा स्नान कर गायत्री माता के दर्शन कर ऋषिकेश घूमते हुए हमलोग सभी कटरा (जम्मू ) पहुँचे। वहाँ १० बजे रात में सबके साथ खाना खाकर मिहिर राज (पोता ) को गोदी में लेकर १४ किमी वैष्णव देवी मंदिर के लिए कठिन चढ़ाई के लिए आगे बढ़े जो आस्था एवं विश्वास का परिणाम ही था। वे सब को हिम्मत दिलाते हुए हँसी ख़ुशी से जय माता दी  का नारा लगाते हुए उठते बैठते सुबह में मंदिर के नज़दीक झरना के जलधारा के पास पहुँचे।  वे सभी को बोले कि पानी में पैर डालो तो थकान मिट जायेगी। हमलोगों ने झरना के शीतल जलधारा में पैर रखा तो सचमुच में थकान मिट गयी जो कि आस्था का ही  परिणाम था। फिर नहा - धो कर दर्शन के लिए लाइन लगा और दर्शन कर अयोध्या आये।  वहाँ रामलला की पूजा अर्चना कर हनुमान गढ़ी  होते हुए लौट आये।

उनकी याद में दो पंक्तियाँ  -

                                               

खुशनसीब थे बाबूजी जो संघर्ष  कर हमसभी को जीना सिखा दिए  ,

            चाहे दुनिया कुछ भी कहे, मगर वो अपनी सादगी से सभी के  दिलों में   अपनी  जगह बना लिए ।   

 

 स्व. बाबूजीकोशत - शतनमन।

 

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एक याद ऐसी भी

                                                        -अरविंद कुमार (राजू  )

                                                       सुपुत्र

बरसों पहले लगभग 37 साल पुरानी बचपन की ये बात है।मै शायद मैट्रिक पास कर गया था।हमलोग बाबूजी के अपार प्यार एवं उनके अनुशासन मे रहते थे।उस समय की कुछ रोचक नादानी भरी घटना की मै याद कर रहा हूँ।उस समय पिस्का मोड़ के पास एक सिनेमाहाल (उपहार सिनेमा हाल)का शुभ उद्घाटन हुआ था(जो आज गैलेक्शिया मॉल है)।उसमे दीवार फिल्म लगी थी।

15अगस्त का दिन था।हमारा पड़ोसी वीरेंद्र सिंह (श्री बालेश्वर सिंह जी का भतीजा) सुबह सुबह मुंह मे दतवन लगाए हुए आया और बोला---चलो आज दीवार फिल्म देखने चलते हैं।नए सिनेमा हाल का उद्घाटन होगा, बड़ा मज़ा आएगा। हमलोग (राजा, विजय एवं राजू) बोले कि नहीं जाएंगे, तो बोला कि आज तो स्वतन्त्रता दिवस है, कोई कुछ नहीं कहेगा। हमलोग भी उसके बहकावे मे आ गए। सोचे कि10 बजे सुबह वाला शो देख के 2 बजे तक घर वापस आ जाएंगे।हमलोग तैयार हो के पैदल चलकर उपहार पहुँचकर लाइन मे लग गए। टिकट ब्लैक होने लगा तो हमने सोचा कि जब आ ही गए हैं तो 2 बजेवाला शो देख के 5 बजे घर चले जाएंगे। पर उस शो का भी टिकट नहीं मिला। संयोग से शाम के शो का टिकट मिल गया तो स्वतन्त्रता दिवस पर कोई कुछ नहीं कहेगा ऐसा सोच केहमलोगों ने फिल्म देख ली।

रात के 9 बजे जब हम घर पहुंचे तो देखा कि ग्रिल मे ताला लगा है और लाइट ऑफ है।हमलोग चिंतित हो गए कि अब क्या किया जाए ।ताला खोलने की हिम्मत नहीं , आवाज देंगे तो बाबूजी जग जाएंगे और गुस्सा हो जाएंगे तो हमलोगों ने विचार किया कि गेट की चाबी बिजली के स्विच बोर्ड पर रहती है तो क्यों न ग्रिल से एक छड़ी घुसा के , चाबी के रिंग मे फंसा  के , अपनी ओर खींच के ताला खोल लिया जाए । लेकिन चाबी थी कि छड़ी मे न फंसकर झन्न की आवाज के साथ नीचे जा गिरी। फिर अचानक दरवाजा खुला और वही हुआ जिसका डर था । बाबूजी ज़ोर से चिल्लाये ---तुमलोगों की घर मे कोई

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जगह नहीं है । रात भर बाहर आवारा लोगों की तरह रहो । हमलोग भी काफी डरे सहमे हुए थे कि क्या करें क्या न करें। डर के मारे हमलोग गलियारी के रास्ते घर के पीछे आ गए। पीछे दीवार मे ईंट का खांचा बना था उसके सहारे हमलोग छत पर चढ़ गए फिर नीचे कूद गए । कई बार आवाज देने पर किचन की तरफ से रेणु ने दरवाजा खोला । बाबूजी के गुस्साने की आवाज सुनकर सामनेवाले मकान से किराएदार श्री वीरेंद्र सिंह आ गए एवं पूज्य बाबूजी को समझा बुझाकर शांत किए । वे बोले कि इन लोगों ने गलती कर दी है । अब से ये लोग ऐसी गलती नहीं करेंगे , इनको माफ कर दीजिए।  हमलोगों ने भी बाबूजी से माफी मांगी और बोले कि अबसे ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे । कहीं भी जाएंगे तो बता कर ही जाएंगे । फिर पूज्य बाबूजी ने प्यार से समझाया कि घर मे सभी लोग हमारे लिए कितने चिंतित थे । फिर पूज्या माँ बोली कि चिंता के मारे बाबूजी कितना घर बाहर करते करते बार बार रोड पर जा जाकर देखते थे कि अब आएगा ,अब आएगा । अंत मे हारकर ग्रिल मे ताला लगाए । हमलोग वो समय कैसे गुजारे हमलोग ही जानते हैं । अंततः मामला शांत हुआ और हमलोग खाना खाये । हमलोगों को भी अफसोस हुआ कि बता कर जाना चाहिए था ।

हमारे प्यारे बाबूजी काफी सीधे सादे व्यक्ति थे । वे चाहते थे कि हम सभी भाई बहन पढ़ लिख कर अच्छे योग्य व्यक्ति बने । आज उन्ही के पुण्य प्रताप से हम सभी भाई बहन उनके मार्गदर्शन मे इस योग्य बन सके हैं कि  समाज मे अपना स्थान बना सकें । हमलोगों को योग्य बनाने मे उनके त्याग और स्नेह को हम सब कभी भी नहीं भूल सकते हैं ।

 

 

 

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बाबूजीकी याद

                                                              -अश्वनी राजन

                                                                         (भतीजा )

बाबूजी की पाँचवी बरखी है। इन पाँच सालों मे बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन  मेरी यादों का एक सिरा जो गाँव से ले कर  यहाँ तक अटका हुआ है, वह सिरा अभी तक उलझा हुआ ही  है। कहते हैं ,बड़े –बुजुर्ग परिवार के वट वृक्ष होते हैं । उनका होना ही संबल देता है । हम सभी ने बाबूजी से हमेशा कुछ पाया । भौतिक प्राप्तियाँ विस्मृत हो जाती हैं लेकिन सुविचार ,साधिकार आदेश का अपनापन और किसी भी किस्म की चूक पर खुद का पश्चाताप वो अमिट लकीरें होती हैं जिनसे बड़ी लकीर खींच पाना संभव नहीं । मैं बाबूजी को अपने सबसे बड़े अवलंब के रूप मे पता था और इस अवलंब का छिन जाना मुझे कई बार विचलित करता है,हताश करता है । मैं सोचता हूँ ,बाबूजी होते तो इस अवसर पर ऐसा कहते या करते ,लेकिन उनकी भौतिक उपस्तिथि के बिना मन नहीं मानता । मन उनके कमरे मे उस खूंटी पर बार बार जाकर टंग जाता है ,जहां कभी वे अपना कुरता टांगा करते थे । कहते हैं , शब्द कभी नहीं मरते । आत्मा की अमरता के बीच शब्द ही हैं जो बार बार आकर प्रहार करते हैं । मैं उनके शब्दों को ढूँढता हूँ लेकिन वे दिखाई नहीं पड़ते । शब्द दिखते नहीं हैं,आत्मा मे पैठ कर अपने होने  का अहसास कराते हैं । मैं बाबूजी को साधिकार याद करता हूँ ,सायास याद करता हूँ और उनके नहीं होने को अब भी स्वीकार नहीं पाता । हमारे परिवार के समूहिक संस्कारों मे बाबूजी का इकबाल हमेशा ही रहा । उनका कहना पत्थर की लकीर होता था। उनकी चिंताओं के साथ पूरा परिवार चिंता मे डूब जाता था और उनके चेहरे पर खुशियाँ पाते ही हम सभी चहक उठते थे ।वे हमारी हर छोटी बड़ी जरूरतों का ख्याल रखते थे । कई बार मन की बात उनसे कहते ही ऐसा समाधान आता कि  सारा बोझ सहसा उतर जाता । हम सभी पथिक थे और वे हमारी मंज़िलों के लाइट हाउस ।एक ऐसी मंज़िल जहां पहुँच जाना हम सभी का ध्येय होता । लेकिन उनके अनुभवों के आगे हम कहाँ टिकते । हम हाथ पाँव मारते रहते और अंत मे वे 

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पुचकारते हुए हमे हमारी मंज़िल  का रास्ता दिखा देते । उनकी सहजता मे लिपटी अभिव्यक्तियाँ तमाम उम्र बीत जाने के बाद भी हममे से किसी मे नहीं आ पाई है और शायद न कभी ऐसा होगा । हम भौतिक आस्वादों मे लिपटे रहते और वे हमे आसानी से जीवन का सार बता जाते ।सरल भी , निश्छल भी , कठोर भी और करुण भी । उनके व्यक्तित्व के सभी पहलू साल –दर साल याद आते रहे हैं । उन यादों से न मैंने कभी पीछा छुड़ाया , न उन्होने यादों से कभी किनारा ही किया ।इससे एक संतोष होता है कि  बाबूजी जहां कही भी हैं  हम सभी पर उनकी नज़र है । वे हमारे परिवार पर अपना आशीष बनाए रखें यही हमारे लिए उनका परम आशीर्वाद होगा ।

बाबूजी की छाया भारी थी । जब वे कमरे मे आते थे ,कितनी भी गहरी नींद मे हों ,उनके पास होने का पता चल जाता था । उनकी दृष्टि सभी पर बराबर बनी रहती थी । परिवार का एका उन्हे पसंद था ,इस पर उन्हे गर्व भी था । घर की हर हलचल को वे बिना बताए जान लेते थे और उसी के अनुरूप अपने अनुभवों से युक्ति निकालकर बताते थे,जो सबको स्वीकार होता था । मुझे इस बात का इलहाम है कि  जितना उन्होने हमारा ख्याल रखा , हम उनका उतना ख्याल न रख पाये । आजीविका की मजबूरियाँ  हों या फिर खुद के घर परिवार की चिंताएँ ,हम उन्हे उतना लौटा नहीं पाये,जो उनका हिस्सा था ,लेकिन बड़े शायद ऐसे ही होते हैं । खुद घोसला बनाते हैं और फिर बच्चे  जब बड़े हो जाते हैं तो उन्हे उन्मुक्त उड़ान के लिए आज़ाद कर देते हैं , ताकि जीवन की चुनौतियों मे कभी कमजोर न पड़ें । उन्होने ऐसा ही किया और शायद यही वजह है कि  हम आज भी उनके आशीर्वाद से बड़ी से बड़ी चुनौतियाँ पार कर जाते हैं।  बाबूजी आप हमेशा हमारे दिलों मे रहेंगे । हम हर साँस मे आपको याद करते हैं । आप जहां भी हैं एक नक्षत्र की तरह हैं,  हमारी प्रार्थना है कि आपका आशीर्वाद हम पर हमेशा बना रहे ।

 

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मेरे प्यारे दादाजी

                                                                                                                                                                                    ---कुमार अभिषेक (मुन्नू)

                                                         सुपौत्र

 

मेरे प्यारे दादाजी

जिन्हे प्यार से हम पुकारते बाबाजी ।

वो मानते थे इतना ,

कोई समझ न पाये जितना ।

                                    माता, पिता ,भाई ,बहन ,चाचा और चाची ,

                                    लगाते थे ज़ोर बनाने को प्यारी पहचान ।

                                    मामा ,मामी,फूफा ,फूफी ,नाना और नानी

                                    लगाते थे ज़ोर दिखाने को मान-सम्मान ।

 कोई समझ न पाये जितना ,

वो मानते थे इतना ।

जिन्हे प्यार से हम पुकारते बाबाजी ,

मेरे प्यारे दादाजी ।

 

                                                                                   

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मेरे प्रियतम बाबा

 

कभी बचपन की सोचते हैं

तो आप याद आते हैं ।

आत्मा को छू जाए जो 

कभी ऐसे प्रेम को ढूँढते हैं

तो आप याद आते हैं ।

 

 

कभी घर छोड़ के

ज़िन्दगी के सफर में बड़ा कदम लेना हो

तो आप याद आते हैं ।

कभी उस सुकून को ढूँढ़ते हैं

जो ज़िन्दगी की सारी थकान मिटा दे

तो आप याद आते हैं ।

 

 

कभी बिल्कुल असहाय महसूस करते हैं

तो आपको याद करते हैं ।

याद करते हैं उन दिनों को

जब आप अपनी कहानियाँ सुनाते थे ।

याद करते हैं उन दिनों को

जब बाबा का पान लाने

हम पंडित की  दुकान पे जाते थे ।

 

                                    याद करते हैं उन दिनों को

                                    जब मुझसे मिलने

                                    स्वास्थ्य को भूल कर आप 

                                    पैदल चल कर भी आ जाते थे।

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याद करते हैं उन दिनों को

जब आपके चरणों में स्वर्ग का आनंद हम पाते थे ।

याद करते हैं उन क्षणों को

जब स्टेशन पे छोड़ने आते आप

और नम हम दोनों की आँखें हो जातीं थीं ।

 

                                    याद करते हैं उस प्यार को

                                    जिसकी तुलना किसी से न

                                    हुई है और न हो सकेगी ।

 

हमें अच्छा करता देख कभी

आप ऊपर से मुस्कुराते होंगे

इसी से संतोष करते हैं अब हम

क्योंकि ज़िन्दगी हमें कहीं भी ले जाये

आपकी याद तो अंतिम साँस तक आयेगी ।

                                                           

                                              ……. आपका प्यारा पौत्र

                                                   अरुणाभ अर्णव  (सन्नी)

 

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मेरे प्यारे बाबा

                                               

                                                    -पारिजात परिमल (अंकुर )  

                                                 सुपौत्र

 

हम सब अपने जीवन मे इतने मग्न हो जाते हैं कि भूल जाते हैं कि  हमारा जीवन ऐसा हो पाया तो वो किसकी वजह से ? पर जब याद आती है तो इतनी सारी यादें साथ आती हैं कि वापिस अपने अभी के जीवन मे लौटने का मन नहीं करता । मै याद करने  की  कोशिश कर रहा था कि मेरे दिमाग मे बाबा की  सबसे पहली याद कौन सी है ? बचपन मे हम अक्सर बाबा की कहानियाँ सुन के सोते थे । मुझे याद है ,बाबा बोलते थे कि पहले मुझे एक कहानी सुनाओ फिर मैं एक कहानी सुनाऊँगा । मैं बड़ी चालाकी से कोई दो लाइन की कहानी सुना देता था कि फिर बाबा कोई अच्छी सी कहानी सुनाएँगे । कभी कभी मैं जब खाने मे नाटक करता था तो बाबा दूध रोटी को स्पेशल खीर बोल के खिलाते थे ।पता नहीं कैसे पर वो मुझे बहुत स्वादिष्ट लगता था । और भी बहुत सी यादें हैं ।  “ओक्का बोक्का  तीन तालुक्का,लौआ लाठी चन्दन काठी ,अजाय बजाय फुचुक “ । ये भी खेलना बाबा ने ही सिखाया था । और हम बाबा के साथ  बचपन मे ये बहुत खेलते थे ।और भी पता नहीं क्या क्या नया खेल बना बना के खेलते थे हम बाबा के साथ ।

मुझे ठीक से याद नहीं कि मुझे डॉक्टर बनने का मन क्यों होता था , शायद वो भी बाबा की वजह से ही । बाबा हमेशा से चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूँ । बाबा मुझसे आखिरी बार जब बात किए थे तब भी वो बार बार दुहरा रहे थे –  “मन लगा के पढ़ना “ । उस समय के कुछ दिन बाद मेरा मेडिकल एंट्रैन्स एग्जाम का रिज़ल्ट आया था। रिज़ल्ट अच्छा था और मुझे अफसोस हो रहा था कि बाबा वो रिज़ल्ट नहीं देख पाये । भले ही अब इंजीनियर बन गया हूँ पर मुझे यकीन है कि बाबा मेरे मेडिकल वाले रिज़ल्ट से बहुत खुश होते । बाबा की सेवा करने मे भी अलग ही सुख का अनुभव होता था । चाहे पैर दबाना हो या क्रैक 

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क्रीम लगाना या सीढ़ी चढ़ने मे सहारा देना। बाबा को पान खाने का बहुत शौक था । पान दुकान पे जा के –  “बाबा का पान देना “ बोल के बाबा के लिए पान खरीदने जाते थे हम । हमने बाबा से पूछा था कि – “बाबा को पान खाना क्यों पसंद है “ तो वो बोले कि उससे मुंह लाल हो जाता है तो अच्छा लगता है । तो हम नादान  बच्चे बाबा को एक दिन ऑरेंज वाली  टॉफी दिये जिससे मुंह थोड़ा लाल हो जाता था । बाबा वो भी बहुत खुशी से खाये । बाबा के जैसा बनने के लिए हम नीम के पत्ते मे ढेर सारी चीनी लपेट के खाते थे और आपस मे बोलते थे कि हम भी बाबा की  तरह पान खा रहे हैं ।

ऐसी बहुत सारी यादें हैं । जैसे भैया जब कॉलेज जानेवाला था तो कैसे बाबा ऊ डेरा से अकेले तबीयत खराब होने पर भी आए थे भैया से मिलने । पापा मम्मी से भी इतनी कहानियाँ सुनी हैं बाबा के बारे मे तो मन मे यही रहता है कि बाबा की तरह का इंसान बनना है । आखिर मे बस यही कहना चाहता हूँ कि हम सब जब भी बाबा को याद करें तो उदास नहीं हों । बाबा हमारे लिए हमेशा खुशी का कारण रहे तो अब भी उनको याद करके बस खुशी ही महसूस करना चाहिए ।

                                   

                                                                                               

 

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गुजरा हुआ ज़माना

                                                            --आकांक्षा (अप्पी )

                                                                       सुपौत्री

एक ज़माना था

फूलों की ख़ुशबुओं से भरा

हमारा भी एक आँगन था ।

याद है वो वक्त ,जब बाबा साथ रहा करते थे ,

दिल  मे हम बच्चों के लिए ढेर सारा प्यार समेटे,

पेड़ के पत्तों से धमाके वाली आवाज निकालना सिखाया करते थे।

और हम सब खूब खिलखिलाते थे।

सिर्फ आधा कप चाय की  प्याली ,बिना शक्कर वाली ,

उनको खूब भाया करती थी ।

 

 एक ज़माना था

लगभग हर रोज, एक मज़ेदार वाकया हुआ करता था ,

जब खाने की टेबल पर ,दादी माँ को जरा सी फटकार मिलती थी ।

“खाली भात  खाइत रहू आहाँ ,देख रहल छी हम”

चेहरे पर दादी माँ के लिए इतना प्यार और इतनी चिंता ,

कि मै तो बस देखती ही रह जाती थी ।

 

हाँ , एक ज़माना था

याद है ना ,वो नीली नीली आँखें ,

वो जबर्दस्त पर्सनालिटी,पान के लिए दीवानगी ।

नज़रें हर वक्त एक छोटे से बच्चे को ढूँढने मे ,

उससे ढेर सारी बातें और मस्ती करने मे ,

और जुबां पर हर वक्त –‘हरि ओम ... कहाँ हैं आप ?”

और  फिर अंतिम समय मे, सीढ़ियाँ पार करवाते वक्त,

याद है उन हाथों का वो स्पर्श ,एक अनमोल अहसास ।

हाँ ,वो भी एक ज़माना था ,

 बस गुजरा हुआ ज़माना ... । 

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यौ बाबूजी मार्ग प्रशस्त करू                                                                                                                                                                       

-मधुलिका ( पुत्रवधू)

 

 

हम ठाढि चौबटिया सोचि रहल

केम्हर जाऊ ,केम्हर जाऊ ,

मझधार मे छी पड़ल

हम एम्हर जाऊ कि केम्हर जाऊ ।

यौ बाबूजी मार्ग प्रशस्त करू

हम की करु, हम कोना रहब ।

छल  जीवन अपनेक  संघर्षमय

अडिग रहलहुं , अपने सदिखन ,

दुख झंझावातक मारि सहि

केलहुं जीवन यापन सुंदर ।

यौ बाबूजी मार्ग प्रशस्त करू

हम की करु, हम कोना रहब ।

भाई बहिन अरिजन – परिजन

निर्वहन कैल जीवन सभहक,

छलहुं सामाजिक व्यक्ति अपने

नहीं छल भाव छोट-बड़क।

यौ बाबूजी मार्ग प्रशस्त करू

हम की करु, हम कोना रहब ।

कर्तव्यनिष्ठ  मितव्ययी रहि

नहि जीवन मे रहल छल-प्रपंच ,

सादा जीवन, उच्च विचारक

मूल मंत्र बनाS, भेलहु सबल ।

यौ बाबूजी मार्ग प्रशस्त करू

हम की करु, हम कोना रहब।

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अपनेक स्मरण मे हम सभ

रहै छी सभ दिन भाव विह्वल,

श्रद्धा-सुमन चढ़ाबी हम

रहत सविनय हमर शीश झूकल।

यौ बाबूजी मार्ग प्रशस्त करू

हम की करु, हम कोना रहब ।

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संक्षिप्त जीवन परिचय                                                                                                                                                                                            -प्रेम प्रकाश (बच्चन)                                                                                                                                                                                (भतीजा)

 

डॉ हरिनन्दन लाल ,पिता स्व राम शरण लाल दास,मूल निवासी –ग्राम भवानीपुर निमेठी ,थाना बहेड़ी ,जिला –दरभंगा (बिहार )के मूल निवासी थे । उनका जन्म संभवतः वर्ष 1927 ई मे उनके पैतृक गृह निमेठी के जमींदार परिवार मे हुआ था । वे अपने पांचों भाई बहनों मे अग्रज थे । अतः रिवाज के अनुसार अपने पिता स्व राम शरण लाल दास के देहावसान के उपरांत भवानीपुर निमेठी सहित पूरी जमींदारी का दायित्व इनके ऊपर आ गया । स्वतंत्र भारत मे जमींदारी उन्मूलन के बाद अपनी पूरी जमीन का रिटर्न सरकार के खाते मे जमा करने के बाद भारमुक्त हुए ।

फिर वे अपमे जीविकोपार्जन के क्रम मे अपना कार्यस्थल वर्तमान मे झारखंड की  राजधानी रांची को चुने जो उस समय बिहार राज्य मे ही पड़ती थी । यहाँ उन्होने रांची गौशाला के प्रबन्धक के रूप मे कई वर्षों तक कार्य किया । बाद मे विपरीत परिस्थितियों मे भी होमियोपैथी चिकित्सा की पढ़ाई करके चिकित्सक का भी कार्य किए । बाद मे रांची विश्व विद्यालय के परीक्षा विभाग मे अपना योगदान दिये । अंततः  

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यहीं से उन्होने अवकाश प्राप्त किया। उन्होने अपने कार्यकाल के दौरान ही जमीन खरीदकर अपना मकान बनाया और रांची उनके अस्थायी निवास स्थान से स्थायी निवास स्थान मे बदल गयी ।   भवानीपुर निमैठी पुश्तैनी निवास रहा । वे अपने पीछे अपनी पत्नी श्रीमती शीला लाल, चार पुत्र एवं एक पुत्री,छह पौत्र ,दो पौत्री सहित भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं ।

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दादाजी का पान

                                                           आलोक राज

                                                                    सुपौत्र

आज भी मैं जब पान की दुकान देखता हूँ तो मुझे दादाजी की याद आ जाती है। दादाजी पान के बड़े शौक़ीन थे। मुझे अक्सर काला - पीला ज़र्दा चूरा पान लाने कहते थे। मैं दादाजी के निर्देश को भूल जाता। मुझे पान या पान मसाला आदि की  कुछ भी जानकारी नहीं थी । मैं सोचता था कि पान तो सभी पान ही है। पान वाला

जो भी पान देता, मैं दादाजी को लाकर दे देता। दादाजी पान तो खा लेते मगर बेमन से। एक दिन दादाजी नाराज़ होकर बोले -   “तुम्हारा लाया पान का स्वाद अच्छा नहीं रहता है।“  दूसरे दिन मैंने पान वाले से कहा कि वह अच्छा पान दे और उस दिन का भी पान दादाजी को पसंद नहीं आया। मुझे साथ-साथ लेकर पान वाले के पास गए और बोले – “ मेरा पोता मेरे लिए जब भी पान लाने आये तुम इसे काला - पीला ज़र्दा चूरा वाला ही पान देना।”

 

अगले दिन दादाजी की पसंद का पान मैं ले आया। दादाजी काफ़ी खुश हुए और उनका वो हँसता चेहरा मुझे आज भी याद आ जाता है।

दादा जी की सीख

मुझे आज भी याद है जब मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने बेलगाम - कर्नाटक जा रहा था और दादाजी का पाँव छुआ तो दादाजी भावुक हो गए।  मुझसे बोले - "आलोक ! पहली बार घर से दूर जा रहे हो, मेरी बातों को याद रखना ।कभी किसी से झगड़ा मत करना, सबों के 

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साथ प्रेम भाव से रहना।  हर एक आदमी अपने घर को दर्शाता है, तुम अपने घर का नाम रौशन करना।

उस वक़्त मैं उन शब्दों के महत्व को नहीं समझा पर जब माइंडट्री कंपनी में काफ़ी लोगों के बीच काम करने लगा तब उनकी बातें सीख बन गयीं और मैं अपने सहकर्मियों के बीच आसानी से घुलमिल जाता था। सभी मुझसे पूछा करते थे कि तुम्हारा घर कहाँ है, तुम्हारी परवरिश  बहुत अच्छी है। 

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अच्छे नहीं लगते

                                                       डॉ० मिहिर राज (अतुल)                                                                                       (सुपौत्र )

बच्चे बिन शैतानी के

पोशाक बिन खादी के

पेड़ बिन डाली के

बाग बिन माली के

अच्छे नहीं लगते ।

 

                        जीभ बिन दांत के

                        चाकू बिन धार के

                        सप्ताह बिन इतवार के

                        भोजन बिन स्वाद के

अच्छे नहीं लगते ।

मीन बिन पानी के

नाव बिन पाल के

मछुआ बिन जाल के 

तालाब बिन पानी के

अच्छे नहीं लगते । 

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                      कवि बिन  कविता के

                        हाथ बिन कंगन के

                        ज्ञानी बिन ज्ञान के

                        वैद्य बिन मरीज के

                        अच्छे नहीं लगते ।

धनुष बिन तीर के

खीरा बिन लत्ती के

मच्छरदानी बिन बत्ती के

अगरबत्ती बिन सुगंध के

अच्छे नहीं लगते ।

                        शादी बिन शहनाई के

                        दुल्हन बिन लाज के

                        ससुराल बिन साली के

                        सास बिन बहू के

                        अच्छे नहीं लगते ।

गुरुकुल बिन गुरु के

कक्षा बिन छात्र के

दादा बिन पोता के 

घर बिन दादा दादी के

अच्छे नहीं लगते ।

 

झरोखे उनकी यादों के

 

.........तुम अब डॉक्टर बनने जा रहे हो ।

मेरा पोता डॉक्टर बनने जा रहा है इस बात से हमको बहुत खुशी है।

डाक्टर बन के मरीजों की सेवा करना । ये बहुत पुण्य का काम है । पता नहीं हम तुमको डॉक्टर बना हुआ देख पाएंगे कि नहीं ... ।

 

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जाने वो कौन सा देश जहां वो चले गए

                                                       -डॉ० ओम प्रकाश (बुल्लू)

                                                                 (भतीजा )

 

बचपन सेही संयुक्त परिवर मे रहना सीखा । चाईबासा मे रहते हुए , जब भी छुट्टी होती पूज्य पापा जी रांची चले आते या फिर हम सब निमैठी अपने गाँव जाते ।दोनों जगहों पर मिलते पूज्य बाबूजी ,माय ,भैया  काका ,दादी माँ एवं संबंधी गण । मेरे लिए पूज्य पापा जी एवं माँ  चाईबासा मे तथा पूज्य बाबूजी एवं माय रांची मे  निवास करते थे । और छुट्टियों का मुख्य आकर्षण होता था कि इनसे भेंट होगी। आरंभ काल से ही  बाबूजी मेरे प्रशंसक रहते हुए मेरा उत्साह वर्धन करते रहे । मैं दिखने मे बच्चा दिखता था तो मेरे मैट्रिक की  परीक्षा के बाद जब मै रांची मे परीक्षा फल से पहले छुट्टियाँ बिता रहा था तो वे किसी भी अतिथि को मेरा परिचय करवाते थे – “ मेरा भतीजा है कक्षा 6 मे पढ़ता है , फिर 7, 8, 9,10 कहते हुए कहते कि इसने मैट्रिक की  बोर्ड परीक्षा दी है । फिर सामने वाला आश्चर्य चकित हो जाता था । उन दिनों  प्रथम श्रेणी मे मैट्रिक  पास होना कठिन माना जाता था । उन्होने परीक्षा फल से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी  कि यह प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण होगा। और सचमुच मैं एक मात्र छात्र था जो प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण हुआ।

एक बार फुर्सत मे बैठते हुए उन्होने अपने होमिओपैथी की  पढ़ाई के बारे मे बताते हुए चर्चा की कि कैसे मनुष्य का कटा हुआ सर पढ़ने के उपयोग मे आता है, जिसमे पूरा मस्तिष्क ,जीभ, गला इत्यादि दिखता है। मैं उस समय सोचता था कि मुझे कभी इसका मौका मिलेगा या नहीं। फिर मेडिकल कॉलेज के प्रथम वर्ष मे एनाटोमी की प्रयोगिक  कक्षाओं मे उनकी ये बातें बिलकुल अक्षरश: स्मरण हो आई ।

उनका लोगों से व्याधि के बारे मे पुछना , फिर मीठी गोलियों की पुड़िया बना कर देना,  हमे बहुत अच्छा लगता था। जब हम बच्चे थे तो हमें  भी मीठी गोलियों की एक पुड़िया मिल जाती थी । बाबूजी के 

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द्वारा किसी को इंजेक्शन लगाते देखना   जैसी घटना हमे बहुत रोमांचित करती थी । शायद तभी से  मेरे मन मे डाक्टर बनने की चाह पैदा हो गई थी।

ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने , फालतू के फिजूल खर्च से बचने जैसी कुछ अच्छी सीखें मुझे आज भी उनकी याद दिलाती है।  2007 मे जब मैं रांची मे पदस्थापित हुआ तो उनकी खुशी एवं आँखों की  चमक मेरी यादों मे आज भी ताजा है । फिर उनको लेकर मेरी पहली बार कार से जमशेदपुर यात्रा थी फिर भी उनका विश्वास था कि मैं सकुशल पहुंचूँगा । उनके इस विश्वास ने मेरे भीतर भी विश्वास पैदा कर दिया।

अंतिम दिनों मे जब वे अस्पताल मे थे मैं उनसे मिलने गया ।पर वे कुछ समझ पाने या बोल पाने मे असमर्थ थे । अचानक रात मे उन्हें  गहन चिकित्सा कक्ष मे ले जाया गया  और रात्रि मे ही वे दिव्य लोक को प्रस्थान कर गए। प्रात: काल समाचार ज्ञात होने पर  यह विश्वास  ही नहीं हुआ कि उनकी स्वस्थ हो कर घर जाने की  प्रतीक्षा अपूर्ण रह गई ।

उनके साथ बिताए गए क्षणों को कलम  बद्ध कर पाना असम्भव है। वे दिव्यात्मा थे  और अवश्य ही वैकुंठ धाम मे आनंदपूर्वक होंगे पर  उनकी मधुर स्मृतियाँ हमेशा  हमारे हृदय  मे उनकी याद दिलाती रहेंगी।

                                                                       

                                                                      

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छोटी- छोटी यादें

                                              -आयुष (बाबा का हरिओम)                                                                  सबसे छोटा  पोता

 

यूं तो मुझे बाबा के बारे मे कुछ ज्यादा याद नहीं है क्योंकि जब मै छोटा था तभी वे गुजर गए थे । पर जैसा  मै सुना करता हूँ कि वे बड़े ही नेक एवं बुद्धिमान व्यक्ति थे । वे हम सभी बच्चों का बहुत ख्याल रखते थे । हम सभी बच्चों का एक अच्छा भविष्य चाहते थे । एक छोटी सी घटना मुझे याद है । जब मै दूसरी या तीसरी कक्षा मे था तो बाबा मुझे इतना प्यार करते थे कि वे मेरे स्कूल से आने का इंतज़ार करते थे । वे कड़ी धूप मे भी घर –बाहर करते रहते थे और लोगों से पूछते रहते थे –“बाबू अखन तक नई एलई ?और मै बाबा से छुपते छुपाते गलियारी के रास्ते अपने रूम मे आकर चुपचाप ड्रेस बदल लेता था । तब बाबा मुझे खोजते खोजते रूम मे आ जाते थे और हंस के पूछते थे ---“मेरा हरिओम कब और किस रास्ते से आ गया ?”मेरे  बच्चा मन को बाबा को परेशान करने मे बहुत आनंद आता था और मै खिलखिलाकर हँसता था । बाबा मेरे साथ तरह तरह के खेल भी खेलते थे । मै अक्सर बाबा से लूडो मे हार जाता था और रोने लगता था और एक और बार खेलने की  ज़िद करता था । बाबा तब तक मेरे साथ खेलते रहते थे जब तक मै जीत न जाऊँ ।

एक और छोटी सी याद है –बाबा बोलते थे –“मै भी तुम्हारे स्कूल मे पढ़ने जाऊंगा । “तब मै बोलता था –आप मेरे स्कूल मे जरूर आइएगा पर दूसरे बस मे ,जिसमे सिर्फ बाबा लोग बैठते हैं । मेरी बातों को सुनकर बाबा खूब हँसते थे ।

वे अक्सर मुझे कहते थे –“हरिओम ,तुम इतना पढ़ो ,इतना पढ़ो कि सब बोले ,देखो ,हरिओम के दादा जा रहे हैं । वह मुझसे बहुत प्यार करते थे और मुझे सही गलत के बारे मे भी बताया करते थे । आज मै जानता हूँ कि बाबा का आशीर्वाद मेरे साथ है जिसकी मदद से मै हर कठिन समय को आसानी से पार कर लेता हूँ ।

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बाबूजी : एक देवतुल्य व्यक्तित्व

                                                

                                               डॉ० विनीता माधुरी (पुत्रवधू)

 

परम आदरणीय,परम श्रद्धेय बाबूजी के ध्यान अबिते कतेको स्मृतिचित्र मानसपटल परआबि जा रहल अछि।मोन जेनाओहि स्नेह के फुहार मे भीज रहल अछि।पहिलबेर सासुर एला पर हमरा अपन घरक खिड़की स देखई मे दू टा दृश्य बड़ नीकलागई छल ,एकटा पहाड़ी मंदिर आ दोसर बाहर बारी मे पाकल पाकल लतामक गाछ।एक दिन बाबूजी तीन चारि टा पाकल लताम अपने लेने एलखिन्ह-”,खा कय देखियौ,आहाँ के नीक लागत”।ओ सब दृश्य अखनों बिसरल नहि जाइत अछि।

ओ हमर  पितृतुल्य छलाह। विवाह के पश्चात सासुर एवं सासुर परिवार के बारे में एक पुत्र-वधू के मोन में कतेको भय एवं आशंका के धुकधुकी रहैत छैक।किन्तु बाबूजी अपन स्नेहपूर्ण व्यवहार सं हमरा मोन मे एहन विश्वास जगोलनि जे सच में सासुर अपन घर सन लागल । पुतहु एवं बेटी में किछु फर्क छै ई अहसास कहियो नहिं होबय देलखिन्ह । चाहे कोई जरूरी  निर्णय लै के क्षण हो चाहे परिवार  के लेल कोई संकट के घड़ी ओ सब के साथ ल क चललखिन्ह । हमर बाबूजी के ई सब सं पैघ  विशेषता छलैन्ह जे छोट आ पैघ सब के साथ ल क चलै छलखिन्ह ।

हुनकर सोच अपना समय स बहुत आगू के छलैन्ह।बहुत प्रगतिशील एवं बहुत उदार।परिवार मे सबके जीवन अपना ढंग सौं जिये के स्वतन्त्रता देने छलखिन्ह,चाहेओ बेटा-बेटी होथिंन्ह  अथवा पुत्रवधू।एक सहज स्नेहपूर्ण अनुशासन मे ओ पूरा परिवार के जोड़ि कय रखने छलखिन्ह।

हुनक जीवनयात्रा पर दृष्टि जाइत अछि त लागैत अछि जे ओ एकटा महमानव छलाह।ओ जीवनपर्यंत संघर्ष एवं कर्मठता के श्रेष्ठ उदाहरण छलखि न्ह।अपन परिश्रम एवं लगन सौं ओ समाज मे अपन श्रेष्ठ स्थान बनबई मे सक्षम भेलखिन्ह।ओ एकटा स्वनिर्मित व्यक्ति छलाह।

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मेरे नाना जी की यादें

- डॉ0 सौरभ मल्लिक (नाती)                                                  

यूं तो लोगों को अपने नाना जी के साथ रहने का मौका नहीं मिलता, पर ये मेरा सौभाग्य था या दुर्भाग्य कि मैंने अपने नाना जी के साथ बाल्यावस्था से युवावस्था तक का समय गुजारा । जब मैं साढ़े तीन साल का था तब मैंने  अपने दादा  जी को खो दिया तो मुझे दादा जी का प्यार भी नाना जी से ही  मिला ।

यूं तो बहुत सारी यादें हैं  मेरी  नाना  जी के साथ ।  उनमे से एक है कि 12वीं मे मैंने बायोलॉजी  लिया था क्यों कि मैं डाक्टर बनना चाहता था । परीक्षा के बाद मेडिकल की तैयारी मे दिल्ली जाना था । मैं घर मे पहला बच्चा था जो घर से बाहर जाने वाला था। सभी कोई चिंतित थे कि मैं अकेले कैसे जाऊंगा , कैसे रहूँगा ? दिल्ली मे मेरे भैया  रहते थे फिर भी सभी चिंतित थे कि मैं दिल्ली मे अकेले मम्मी को छोड़ कर कैसे रहूँगा। सभी कोई अपनी अपनी  राय दे रहे थे , क्या करना है और क्या नहीं करना है। दिल्ली रांची की  तुलना मे काफी बड़ा शहर था । वहाँ  अलग नियम कानून होगा। शायद यह सोच कर मेरे मन मे सवालों की ज्वालामुखी फूट रही  थी  । तब मैंने नाना जी से दिल्ली के बारे मे पूछा ।नाना जी ने दिल्ली के बारे मे बहुत सारी जानकारियाँ दी और ये बताया कि दिल्ली मे कभी रोड पर कहीं कचरा, प्लास्टिक कवर आदि नहीं फेकना । रोड के साइड मे  पेशाब नहीं करना , ऐसा करने से वहाँ पुलिस पकड़ के  ले जाती है। वहाँ दिल्ली मे लोग मैं मैं कर के बात करते हैं , हम हम करके नहीं करना। मन लगा के पढ़ना , किसी से झगड़ा नहीं करना। दिल्ली मे लोग रोटी ज्यादा खाते हैं ,तो रोटी खाना भात ज्यादा मत खाना । फिर ट्रेन से ज्यादा मत उतरना , यहाँ वहाँ की  चीज मत खाना। इस तरह के कई  इन्सट्रक्शन्स मिले।

दिल्ली जाने वाले दिन नाना जी सुबह से ही पूछ रहे थे कि कोई समान छूटा तो नहीं । सब कुछ चेक करवाने के बाद ही वे निश्चिंत हुए । फिर

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नाना जी किचेन के पास घूमने लगे कि टिफ़िन पैक हुआ कि नहीं, लेट हो रहा है, जल्दी करो । अभी तीन घंटे बचे थे तो मैने नाना जी से हल्के

स्वर मे कहा कि अभी बहुत टाइम है । तब नाना जी ने कहा कि स्टेशन पर इंतजार करना अच्छा है। फिर नाम आँखों से मेरी विदाई हुई । ट्रेन आने मे देर थी तो मैंने सोचा कि बेकार मे नाना जी हड़बड़ाते रहते हैं । ट्रेन मे भी मैं नाना जी की ही बातें सोच रहा था कि यदि दिल्ली मे कहीं ज़ोर से पेशाब लगा तो क्या करूंगा ।

बहुत सारी आशंकाएं लिए दिल्ली पहुंचा । यहाँ बहुत दौड़  भाग की  जिंदगी थी । पर धीरे धीरे पता चला कि यह भी किसी आम शहर के जैसा ही है। यहाँ भी लोग रोड साइड मे पेशाब करते हैं। धीरे धीरे मैं भी दिल्ली  के रंग मे रंग गया । मैं मैं कर के बातें करने लगा । जिंदगी के कई सबक सीख  लिए । मैं अब थोड़ा कॉन्फिडेंट महसूस करने लगा ।साल गुजर गया और मैं रांची आ गया।

कुछ वर्षों के बाद डेंटल कॉलेज मे एड्मिशन के बाद मैं चेन्नई जाने वाला था । फिर से नाना जी ने बहुत सारी बातें समझाई । मैं अब धीरे धीरे थेथर होने लगा था । नाना जी बोले कि लेट हो रहा है फिर भी मैं धीरे धीरे काम कर रहा था । जब एक घंटा समय बचा तो मैं घर से निकला । तब पता चला कि ऑटो की  स्ट्राइक है । अब तो मैं पसीने पसीने होने लगा । किसी तरह एक रिक्शा मिला और मैं दौड़ते भागते स्टेशन पहुंचा । ट्रेन हॉर्न दे रही थी। जैसे तैसे मैं ट्रेन पकड़ पाया । तब अहसास हुआ कि नाना जी गुस्सा क्यों  करते  हैं । अब मैं कोशिश करता हूँ कि ट्रेन के टाइम से पहले ही स्टेशन पहुँच जाऊ ।

नाना जी बहुत खुश थे कि मैं अब दांत का डाक्टर बनने वाला था । मैंने सोचा कि अब मैं नाना जी के दांतों का नया सेट बना दूंगा । पुराना वाला उन्हें बहुत परेशान कर रहा था । पर मेरी बदकिस्मती थी कि मेरा कोर्से कंप्लीट होने के पहले ही नाना जी हमारे बीच नहीं रहे। मैं उनके दांतों का नया सेट नहीं बना पाया ।इस बात का आज भी मुझे दुख होता है ।

और भी बहुत सारी बातें याद है मुझे नाना जी के साथ  बचपन की। जब शाम को लाइट कटती थी तब हमलोग छत पर  चढ़ कर  नाना

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जी से बहुत सारी कहानियाँ सुना करते थे । यही कह सकता हूँ कि आज मैं जो भी हूँ, नाना जी और नानी  माँ के आशीर्वाद के बिना कभी नहीं बन सकता था ।

लव यू .... मिस यू.... नाना जी, आपको शत शत नमन  !!!!

                                               

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मेरे प्यारे नाना जी

                                                  - सुमन मल्लिक (खुशबू)

नातिन                                                                                        

 

सबने  कहा , तो मैंने भी सोचा कि  कुछ लिख लूँ । मैं सबसे पहले अपने बचपन की  यादें शेयर करना चाहती हूँ जो आज भी मैं अपने छोटे भाई बहनो और बेटे को सुनाती हूँ ।

नाना जी की हर बात हमें लगभग याद है । वे हमेशा चाहते थे कि हम पढे लिखें और जीवन में कुछ करें । आज भी जब हम नाना जी के घर जाते हैं तो उस दरवाजे के उस टूटे पार्ट को देख कर पुरानी यादें  ताजा हो जाती हैं । जब नाना जी और नानी माँ शाम मे टीवी देखा करते थे तो वे दरवाजा लगा देते थे ताकि वॉल्यूम बाहर ना जाय और हम सब पढ़ सकें। पर हम शैतान बच्चे (मुन्नू भैया, मनीषा दीदी,  भैया और मैं ) नीचे बैठ कर उस होल से टीवी देखते थे, वो भो टर्न वाइज़ । और जब भी हम मे से कोई ज्यादा टाइम बैठ गया तो हम झगड़ा  भी करते थे । यह सुन कर जब नाना जी अपने चेयर से उठते थे तो हम सब ऐसे भाग कर अपने अपने रूम मे पढ़ने बैठ जाते थे, मानो कि कुछ हुआ ही ना हो जैसे कि  हम अपने रूम से निकले ही ना हों। पर ये बात तो नाना जी को भी पता थी कि हम वहाँ से छुप छुप कर टीवी देखते हैं । चूंकि ये हमारे डेली के रूटीन मे शामिल था इसलिए वो हमें कभी डांटते  भी थे तो हमे मज़ा आता था।

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नाना जी मुझे और मुन्नू भैया को हमेशा लाउड म्यूजिक के लिए डांट लगाते  थे  हम जब भी गाना बजाते या रेडियो चलाते तो नाना जी

बोलते – “पान दोकान बना क राखि देने छहि । लागई छै ई घर छै? “ नाना जी हमें  बहुत प्यार करते थे इस लिए वो थोड़ा प्रोटेक्टिव रहते थे । हमें समझाते रहते थे । हमारे साथ चेस और लूडो भी खेलते थे । उन्हें किसी का भी देर से  घर आना पसंद नहीं था । वे हमे कभी कभी मम्मी की  डांट से भी बचाया करते थे ।

 आज जब हम बड़े हो गए हैं , खुद पैरेंट्स बन गए हैं तब वो सारी बातें याद आती हैं कि किस तरह हमारी पैरेंटिंग की  गई है। जब हम छोटे थे तो पेरेंट्स को क्रूएल  विलेन समझते थे, जो हमेशा हम सब को डांटते रहते थे । पर यह बोध बड़े होने पर हुआ कि जिसको हम डांट समझ कर रूठ जाते थे उसमे हमारे लिए प्यार और हमारे फ़्यूचर के लिए टेंशन छुपी होती थी ।

मैं भी शायद नाना जी की  तरह ही अपने अक्षज को बड़ा करना चाहती हूँ ।  जिस तरह उन्होने हर कदम पर हमे समझाया ,पढ़ाया, खेलाया और लास्ट तक अपना आशीर्वाद हमपर बनाए रखा, उसी  तरह मैं चाहती हूँ कि उनकी दिखाई हुई राह पर हम भी निःस्वार्थ भाव से प्रेम पूर्वक चलते रहें और नाना जी की स्मृतियों को सदा साथ  रखें ।

नाना जी, आज भी आप हमें देख रहें हैं। सदा अपना आशीर्वाद हमारे ऊपर बनाए रखिएगा ।

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आदरणीय बाबा को समर्पित

                                                                                                                                                ----मनीषा लाल (सुपौत्री )

 

हमारे प्यारे बाबा, कहाँ गए हैं

हम सब मे मौजूद यहीं हैं ।

हमारे प्यारे बाबा, कहाँ गए हैं

हमारी यादों मे साथ हमारे संग हैं ।

                        गुस्से मे जिनके प्यार छुपा हो

                        ऐसे थे हमारे बाबा ।

                        पथ  और पथप्रदर्शक बाबा ,

                        सबके लिए सदा उपस्थित बाबा ।

उत्तरदायित्व जिन्होंने सदा निभाया ,

ज़िम्मेदारी का पाठ समझानेवाले

ऐसे थे हमारे बाबा ।

                        बचपन की क्या याद लिखूँ मै,

                        जब तक बाबा  बचपन तब तक ।

                        कभी आपकी याद जो आती,

                        आपकी जरूरत महसूस जो होती

                        तब समझाते खुद को –

                        बाबा हमारे कहाँ गए हैं

                        हम सब मे मौजूद यहीं हैं ।                                                                                                        

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                                                                नन्दन परिवार का वंश वृक्ष          (प्रेम प्रकाश के सौजन्य से)

       बाबू राजेश्वर लाल दास ( मदन पुर)         

बाबू गोविंद राम दास  (भवानीपुर , निमैठी)

_____________________________।______________________________।______________                             बैद्यनाथ लाल दास   भैरव दत्त लाल दास  हनुमान लाल दास   सुप्रदत लाल दास     इशरी लाल  दास

                                        ।

                             नारायण लाल दास  (नैनावती देवी )

।                                                                                                                                 ।

बनवारी लाल दास                                                                                      गोवर्धन लाल दास

पार्वती देवी

।                                                                                                                                 ।

राम शरण लाल दास                                                                              अशर्फी लाल दास

सत्यभामा देवी , सावित्री देवी                                                                                      x

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।                              ।                         ।                   ।                           ।                      ।

*हरि नंदन लाल     लक्ष्मी नन्दन कर्ण     ब्रजनंदन      निर्मला देवी (पुत्री)   शिव नन्दन लाल  देवनंदन

 शीला लाल             शांति कर्ण        मंजू ज्योत्सना     गिरजपति लाल   गिरिजा, विमला       अर्चना

1 अनिल कुमार लाल( मधुलिका लाल  )–अभिषेक (नीतू), मनीषा लाल (अविनाश कुमार )-देवअंशुमान                                                                                                     

2 राजा अजित कुमार( मधुलिका कुमारी)- आलोक राज, मिहिर राज 

3 अरुण कुमार ( विनीता कुमारी)- अरुणाभ अर्णव , पारिजात परिमल

4 अरविंद कुमार( पूनम चौधरी) – आकांक्षा , आयुष

5 विभा मल्लिक( सुरेश्वर नाथ मल्लिक)- सौरभ (खुशबू साक्षी ), सुमन (अखिलेश कर्ण)- अक्षज

*लक्ष्मी नन्दन कर्ण (शांति कर्ण)-

1  आभा (सच्चिदानंद दास  ) –रौशन, रौनक

2 प्रेम प्रकाश

3 ओम प्रकाश( रानी प्रकाश)- तपस्या  , दिव्यान्शु

4 शोभा ( रवि कुमार कर्ण)- अदित्या राज

*ब्रजनंदन(मंजू ज्योत्सना )-

1 सारिका(राजीव दत्त)- पार्थिवी, पार्थ

2 गौतम (प्रिया)- प्रथम

3।सिद्धार्थ ( चंदा)

*निर्मला देवी(गिरिजापति लाल)- विधुभूषण, नीलिमा, रानी, गुड्डू, शशिभूषण, गिरीश कुमार

*शिव नन्दन लाल (गिरिजा लाल, विमला लाल)

1  अश्वनी राजन(पिंकी) –वंश

2 अंजनी रंजन(ज्योति)- प्रणय , गुनगुन

3 साधना कर्ण  (जितेन्द्र कर्ण) – सिम्मी, सुशांत

*देवनंदन(अर्चना )-

1 हर्षवर्धन

2 श्वेता

3 शारदा

4 ज्ञानवर्धन